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सच कहूँ या झूठ ?

सत्य सुनने में कड़वा होता है, विषैला होता है, भयंकर होता है, मनुष्य के वर्षों से बने आभा मंडल को बिखेर देता है, इतिहास की तो छोड़ो देश और समाज के अस्तित्व पर कालिख पोत देता है,
 इसलिए इतिहास कार, लेखक, प्रसिद्धि पाने के लिए सत्य को छिपाते हैं काल्पनिकता का सहारा लेते हैं, समाज को वो आईना दिखाते हैं जो वर्ग विशेष की उपलब्धियों का बखान करता है,
ऐसा सत्य आप भी नहीं सुनना 👂 चाहते जिसमें आपका अपमान हो, भले ही कोई लेखक अपने अथक परिश्रम से झूठ में छिपे सत्य को उजागर करे, सबसे पहला विरोध उस लेखक का  उसके अपने समाज के लोग करते हैं, इसका भी कारण है क्योंकि समाज को भ्रम और झूठ में भक्ति भाव के साथ जीने की आदत पड़ गई है, अब भला एक अदना से लेखक की क्या मजाल जो समाज के महापुरुषों (भगवानों) का सत्य उजागर करे ?
 अब अगर समाज को वैज्ञानिकता परक बनाना है तो सबसे पहले इन महापुरुषों (भगवानों) को मारना होगा, उनके योगदानों को एक समाजसेवी इंसान की उपलब्धियों के तौर पर देखना होगा, इनकी मूर्तियाँ मिटानी होंगी सिर्फ फोटो लगाना होगा, वो भी पूजा निषेध युक्ति के साथ
प्रणाम करें, आदर करें, अंतर्मन में आशीर्वाद प्राप्त …

सच्चा प्रेम ?

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प्रेम की परिभाषा नहीं मालूम, बनते सभी हैं प्रेम के प्रोफेसर,
😀😀😀
चलिए हम ही आपको बता देते हैं कि सच्चा प्रेम क्या होता है,
स्त्री पुरुष का एक दूसरे में स्वयं का मिला देना प्रेम कहलाता है, सर्व विदित है कि जब दो रसायन आपसे में मिलते हैं तो वे एक दूसरे के गुण और दोष ग्रहण कर लेते हैं, मिश्रित रसायन एक नए रसायन में तबदील हो जाता है यही तबदीली प्रेम कहलाती है,
जो दोनों को एक कर देती है अब आप इस नए रसायन के गुण और दोष देखिए, इसमें दोनों रसायन के गुण और दोष मौजूद होंगे, फिर भी दोनों रसायन एक कहलाते हैं अलग अलग नहीं !
😀😀😀
लेकिन आपका प्रेम कैसा है ?
आपने प्रेम तो किया मगर धोखेबाजी वाला,
क्योंकि सच्चा प्रेम इस धरती पर कभी पैदा ही नहीं हुआ,
ना किसी को मिला,
शारीरिक आकर्षण को आपने प्रेम समझा,
संभोग निवृत्ति को आपने प्रेम पाना समझा,
समर्पण को आपने अपना अधिकार समझा,
दूसरे को खुश रखने के लिए आपने सदैव झूठ बोला,
क्या प्रेम झूठ पर टिका होता है ?
झूठी तारीफें करना, प्रेम की प्रवृत्ति नहीं है, ये तो दूसरे को भ्रमित करने का तरीका है,
सच बताने की या सच सुनने की आपमें हिम्मत नहीं है,
कह क्यों नहीं …

ऊंची जाति नीची जाति ने पका दिया 😀😀😀

थक गया हूँ मैं,
ऊंची जाति और नीची जाति,
के प्रवचन सुन कर,
शायद आप नहीं थके हो ?
मुझे लगता है शायद आप,
इसी जातिवाद में ढंग से पके हो,
अगर आप ऊँची जाति के हैं,
तो आपके लिए प्रवचन देना आसान है,
क्योंकि आप शीर्ष पर बैठे हैं,
जातिवाद के संरक्षक हैं,
आप और आपका धर्म भी महान है,
पेल दीजिए दो चार प्रवचन,
कि शास्त्रों में लिखा है,
मनुष्य जन्म से नहीं,
अपने कर्मों से नीच होता है,
यहाँ गलत कर्म करके,
ब्राह्मण भी अपना ब्राह्मणत्व खोता है,
पता नहीं बाबू,
फेंकू जैसे कितना फेंकते हो ?
अपराधी, बलात्कारी ब्राह्मण की,
कब बदली जाति कहाँ देखते हो ?
एक तो उदाहरण बता दो,
कभी ढंग से कर्मों की सज़ा दो,
नीची जाति वाला,
कितने भी कर ले अच्छे कर्म,
जनेऊ नहीं मिलेगा,
कहता है ये सनातन धर्म,
यहीं पर खुलती है कर्मों की सब पोल,
जन्म की श्रेष्ठता झूठ का ये ढोल,
इसी लिए कहता हूँ थक गया हूँ मैं,
बिना सिर पैर के प्रवचन,
सुनकर पक गया हूँ मैं,
अगर आप नीची जाति के हैं,
तो पक्का बुद्ध ज्ञान बांटोगे,
बुद्धि भ्रष्ट करने को,
कमजोरों को डांटोगे,
आप भी झाड़ोगे समता मूलक प्रवचन,
एक बात बता दो,
जाति विहीन कब हुआ,
बुद्ध का ये धर्म …

ईश्वर की आंखें ?

विश्व के सभी धार्मिक अपने ईश्वर को सर्वशक्तिमान समझते हैं, उनका मानना है कि उनका ईश्वर सब जगह मौजूद है, ईश्वर की निगाहें मनुष्य पर ही लगी रहती हैं, जरूरत पड़ने पर वो मनुष्यों की मदद करता है,
यही तो सबसे बड़ा अंधविश्वास है,
चलो मान लिया आपका ईश्वर सब कुछ देखता है, या यूँ कहूँ आप चौबीस घंटे ईश्वर के कैमरे की जद में हैं, कभी सोचा है इसका अर्थ क्या है ?
कोई भी स्त्री पुरुष बगैर विवाह किए अगर प्रेम करता है तो वो ईश्वर की निगाह में गुनहगार है,
क्योंकि कोई भी धर्म विवाह पूर्व संबंधों को मान्यता नहीं देता है,
अब बताओ कैसे प्रेम करोगे ?
एक तरफा प्रेम किया तो गुनहगार, दोनों तरफ से प्रेम हुआ तो दोनों गुनहगार, अगर संभोग कर लिया तो पक्का सत्यानाश,
😀😀😀
लग गई ना बाट तुम्हारे सच्चे प्रेम की,
और सोचो, उनका क्या होगा जो सारे दिन अपनी आँखें सेंकते रहते हैं, लड़कियों का फिगर नापते रहते हैं, गली, चौराहे पर इसी आस में सर्दी, गर्मी, बरसात झेलकर भी पनवाड़ी या चाय 🍵 की दुकान की शोभा बढ़ाते रहते हैं,
ये सब भी ईश्वर और धर्म की नजर में गुनाह है, अगर गुनाह नहीं है तो बताओ किस धर्म के धर्म ग्रंथ में लिखा है ये सब…

बरगद जैसा

बरगद
सूनसान जंगल में बरगद के विशाल पेड़ के नीचे बैठे धर्ममुक्त ने अपने सहयोगियों से पूछा - इस बरगद से हमें क्या सीखना चाहिए  ?
सभी सहयोगी चुप, उनकी समझ में नहीं आ रहा कि क्या जवाब दें, काफी देर तक कोई जवाब नहीं मिलने पर वो धर्ममुक्त ने कहा  ,
"सुनो बरगद के पेड़ की संरचना हमारे धर्ममुक्त मूल निवासी समाज की तरह से है, विशाल , भव्य , मजबूत!
इसकी शाखाएँ हमारे समाज की तथाकथित जातियाँ हैं चूंकि बरगद की शाखाएँ अपनी अलग अलग जड़ों से भी धरती से संपर्क करती हैं, इसीलिए हमारे समाज की सभी जातियाँ वास्तविकता में अपनी जमीन से जुड़ी हुई हैं ,
हमारी जड़ें एक भी है तो अनेक भी है इसी का फायदा मनुवादी शक्तियां उठाती हैं पहले हमें जातियाँ में बाँटा, फिर ऊंच-नीच का भेदभाव पैदा किया ताकि हम कभी एक ना हो सकें ,
अब समय आ गया है कि हम इन जातियों के बंधन को तोड़ दें, और अपने संपूर्ण समाज को बरगद की तरह मजबूत बनाएँ ,
इतने में एक व्यक्ति पूछ बैठा - धर्ममुक्त जी फिर हम धर्म का क्या करें  ?
धर्ममुक्त बोले - किस धर्म की बात करते हो ?
जो धर्म तुम्हें सदियों से अपना नहीं सका, आज भी तुम्हें अछूत समझता है , तुम्हारे हाथ का पा…

कट्टरता: धर्मों की देन ?

धार्मिकों को धर्म गुरु समझाते हैं कि धर्म ने मनुष्य को जीने का तरीका दिया , संस्कार दिए, सामाजिकता दी और भी न जाने  क्या क्या दिया, चलिए आज हम आपको बताते हैं धर्म ने मनुष्य को एक सबसे खतरनाक चीज भी प्रदान की है जिसने आज संपूर्ण मनुष्य प्रजाति को विनाश की कगार पर ला खड़ा किया है, "वो है कट्टरता, किसी दूसरे धर्म या संप्रदाय या समुदाय के प्रति वैमनस्य अथवा उसके विनाश की प्रवृत्ति धर्म की रक्षा/ स्थापना के नाम पर रखना कट्टरता कहलाती है" 
जी हाँ, यही यथार्थ सत्य है, जिसे कोई भी धर्म वाला मानने को तैयार नहीं, उनसे पूछो "क्या आपका धर्म कट्टर है ? " तो जवाब मिलेगा - बिल्कुल नहीं, उलटा वो आपको अपने धर्म की इंसानियत समझाने लगेगा, बस यहीं से आपका अपने धर्म पर विश्वास और बढ़ने लगता है,  परंतु हम ऐसा नहीं करेंगे, हम आपको आपके धर्म का यथार्थ कट्टर सत्य बताएंगे, जिसे आप कभी झुठला भी नहीं पाओगे, तो चलिए मित्रों करते हैं शुरुआत, सनातन वैदिक धर्म इस धर्म में कितनी कट्टरता है इसका प्रमाण आप धर्म गुरुओं के प्रवचनों में नहीं पा सकते, इसके लिए आपको इस धर्म की तथाकथित ईश्वर प्रदत्त किताब…

रक्षाबंधन एक स्वार्थ

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आज है #Agreement day यानी रक्षाबंधन,
मानसिक, शारीरिक, आर्थिक दृष्टि से स्वयं को कमजोर समझने वाली महिलाएँ अपनी रक्षा के लिए पुरुष को संकल्प धागा बांधती हैं, जिससे पुरुष उनकी रक्षा करने के लिए उत्तरदायी रहे,
उपरोक्त लिखित परिहास शैली की परिभाषा ही रक्षाबंधन का यथार्थ सत्य है,
उदाहरणतः वामन अवतारी विष्णु को जब राजा बली अपने साथ पाताल लोक ले जाता है तब लक्ष्मी जाकर बली को धागा बाँधकर विष्णु को माँग लाती हैं यहीं से रक्षाबंधन की शुरुआत होती है,
इस कथा में राजा बली और लक्ष्मी में कोई प्रेम सम्बन्ध नहीं होता है ना वे जन्म से सगे भाई बहन होते हैं, यहाँ  होती है सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति ! 😀😀
दूसरी कथा में, वृत्रासुर युद्ध के समय इंद्र की विजय के लिए इन्द्र की पत्नी शची , इंद्र को धागा बाँधतीं है यहाँ प्रेम है परंतु अफसोस वो पति पत्नी का है 😀😀😀
तीसरी कथा महाभारत  से  है जिसमें शिशुपाल वध के  समय कृष्ण की उंगली घायल हो जाती है तब द्रोपदी उस पर कपड़ा बाँधती है ये तो आम बात है इसे भी पाखंडी रक्षाबंधन की कथा बताते हैं ,
मेरी समझ में ये नहीं आया, इतनी कथाओं में एक भी कथा सगे भाई बहनों से संबंधित…

सिर्फ जाति मुक्त भारत नहीं धर्ममुक्त भारत चाहिए

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जब हम धर्ममुक्त भारत की बात करते हैं तो कुछ अंबेडकरवादी, बुद्धिजीवी, उदार वादी मित्र कहते हैं हमें धर्म से आपत्ति नहीं है हमें जातिवाद से आपत्ति है,

कमाल का तर्क है ये तो वही बात हो गई, हमें पापी से समस्या नहीं है हमें पाप से समस्या है , 😀😀
चलिए आज आपको यही समझाते हैं कि समस्या की जड़ कहाँ है ?
जातिवाद की उत्पत्ति कहाँ से होती है ? इस पर अंबेडकर जी भी बहुत सी पुस्तकें लिख गए, बहुत से और विद्वानों ने भी समाज को समझाया, कुछ ने धर्म के पक्ष में कुछ ने धर्म के विपक्ष में, अब हमारी बारी,
सनातन धर्म के अनुसार ईश्वर ने चार तरह की सामूहिक प्रजा की उत्पत्ति की, जिन्हें आप मुख्य जाति कह सकते हैं, आपको भ्रमित करने के लिए इन्हें धर्म ग्रंथों में वर्ण कहा गया, जिन्हें आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के नाम से जानते हैं , यानी कि ईश्वर ने ही वर्ण के नाम से मुख्य जातिगत वर्ग की उत्पत्ति की, जो कि साबित करता है कि मुख्य जातिवाद ईश्वर प्रदत्त है,
इसके आगे कुछ बुद्धिजीवी कहते हैं कि ईश्वर ने वर्ण व्यवस्था बनाई लेकिन मनुष्यों ने इसे जाति व्यवस्था में बदल दिया, सच कहते हैं हमारे बुद्धिजीवी मित्र,…

किसने पैदा किया मनुष्य ?

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समाज में धर्मों ने एक अवधारणा फैला रखी है कि मनुष्य को पैदा करने वाला ईश्वर है, बड़े बड़े बुद्धिजीवी इस पर तर्क देते हैं लेकिन साबित नहीं कर पाते हैं,
चलिए आपको हम मिलवाते हैं सच्चाई से,
बाइबिल ( Old testament) यहूदी धर्म का धर्म ग्रंथ है भले ही इसे ॠग्वेद के बाद का माना जाता हो परंतु इसमें लिखे तथ्य ॠग्वेद से भी प्राचीन लगते हैं इसका भी कारण है क्योंकि सनातन धर्म के सभी कर्मकांड बाइबिल (Old testament) से ही प्रेरित हैं, लगा ना झटका ?
तो चलिए पहले हम कर्मकांड और तथ्यों से ही निबट लेते हैं,
बाइबिल की शुरुआत उत्पत्ति की पुस्तक से होती है जिसमें परमेश्वर की आत्मा जल पर तैरती है ठीक वैसे ही जैसे सनातन धर्म में विष्णु तैरते हैं,

परमेश्वर सृष्टि रचना करने की सोचते हैं और सात दिनों में सृष्टि का निर्माण कर देते हैं सनातन धर्म में विष्णु की नाभि से ब्रह्मा निकलते हैं और सृष्टि का निर्माण कर देते हैं,

परमेश्वर मनुष्य को पैदा करने के लिए आदम और इव (हव्वा) को बनाते हैं और इनका नाम मनुस्सा रखते हैं तो सनातन धर्म में ब्रह्मा अपने मानस पुत्र मनु और शतरुपा को पैदा करते हैं, दोनों ही धर्मों में स्त्री…

आत्मा का अंधविश्वास ~ धर्ममुक्त जी

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दिल्ली के बुराड़ी में 11 लोगों की रहस्यमयी मौतों ने एक बार फिर बुद्धिजीवियों को आत्मा के अंधविश्वास का भयावह परिणाम दिखा दिया,
अब प्रश्न ये उठता है कि ये आत्मा का कांसेप्ट आया कहाँ से ? 😏😏
तो मित्रों आत्मा को जन्म देने वाले हैं धर्म, और आत्मा से ही जुड़ा हुआ है धर्मों का परमात्मा,
धर्म कहते हैं प्रत्येक जीव में एक आत्मा होती है जो हमेशा अपने परमात्मा से जुड़ी होती है, परमात्मा उस जीव के कर्मों का हिसाब रखता है और मृत्यु के पश्चात कर्मों के आधार पर जीव को स्वर्ग अथवा नर्क की प्राप्ति होती है,
ये तो हुई आत्मा और परमात्मा के कनेक्शन की बात, परंतु विज्ञान और मैं ऐसी किसी भी अवधारणा को सिरे से खारिज करते हैं,
आत्मा और परमात्मा के कनेक्शन के बीच में एक स्पेस स्टेशन भी है, धर्म कहते हैं कि जब कोई मनुष्य अकस्मात दुर्घटना वश अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसे ईश्वर के स्वर्ग अथवा नर्क में प्रवेश नहीं मिलता है तो उस मनुष्य की आत्मा उस स्पेस स्टेशन पर रुक जाती है, और कुछ समय पश्चात वो आत्मा वापस पृथ्वी पर आ जाती है,
😀😀😀
यहीं से शुरू होता है आत्मा का डर 😱 और अंधविश्वास फैलाने का खेल,
धर्म …